रामायण में बहु-विवाह

रामायण में बहु – विवाह

मंथरा के उकसाने से,

कैकेयी ने , पुत्र – निहित स्वार्थ और

दशरथ के प्रेम का नाजायज लाभ,

उठाकर, राम का वनवास चाहा.

पंचवटी के प्रहरी लक्ष्मण पर,

शूर्पणखा ने डोरे डाले

हारकर जब शूर्पणखा ने अपना

विकराल रूप दिखलाकर,

आतंक फैलाना चाहा, तो

लक्ष्मण ने उसके नाक – कान

काट दिए – यह कहकर, कि

कभी किसी को छलने लायक नहीं बचेगी.

 

उधऱ स्वाभिमान बोला, और

रावण ने धूर्तता से सीत को हर लिया.

इधर पौरुष जागा, और

राम ने स्वर्णिम लंका दहन कर, 

सीता को वापस पाया.

यदि दशरथ बहु – विवाह न अपनाते, तो

भरत और राम सहोदर होते,

न मंथरा उकसा पाती,

न ही कैकेयी का स्वार्थ होता,

शायद रामायण ही नहीं होती.

देखा बहु – विवाह ने रामायण रच दिया.

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वाह रे तकदीर !!!.

जैसे समाज कहता है, ईश्वर ने भी उनकी सुनी. घर में चार पुत्र रत्न हुए. किंतु उसी भगवान ने ही उन्हें एक पुत्री की तमन्ना भी दे रखी थी. कभी कभी तो लगता है कि ईश्वर कभी भी, किसी को भी परिपूर्ण नहीं रहने देता. कहीं न कहीं कोई कमी छोड़ ही जाता है. कुछ नहीं तो एक कामना ही सही, जो उन्हें अंदर ही अंदर खाई जाती है. शायद उसे परिपूर्ण मानव की ईश्वर से होड़ करने का डर है. वैसे भी आज मानव ईश्वर को तरह – तरह से ललकार ही रहा है. जब ईश्वर अपने तेवर दिखाते हैं तो आपदाएँ आ जाती है. रूप कोई भी हो – यह सब मानव के नियंत्रण से बहुत ही परे होता है जैसे – भूकंप, अकाल, बाढ़, सुनामी और कुछ नहीं तो आतंकवाद.मुहल्ले में एक स्वामीजी का परिवार होता था. वे नाम के स्वामीजी थे, न कि धर्मावलंबी गेरुआ पहनने वाले. पूरा परिवार व मुहल्ला उन्हें पापा के नाम से जानता – पुकारता था. परिवार भरा पूरा सर्व संपन्न था. किसी भी सामाजिक पारिवारिक या आर्थिक नजरिए से कमजोर नहीं, वरन् बहुत ही शक्तिशाली था. बहुत बड़ा दिल था, पति – पत्नी दोनों का. किसी के लिए भी, खासकर बच्चों के लिए उनका हृदय हमेशा खुला था. मुहल्ले के किसी भी बच्चे के लिए वे कुछ भी करने को तत्पर रहने वाले दंपति थे.

एक और बिडंबना देखी. पापा के मकान के पड़ोसी राव साहब के घर मात्र पुत्रियाँ ही थीं. सारी की सारी पुत्रियाँ थी बला की खूबसूरत, किंतु वे थे कि एक पुत्र रत्न को तरस गए थे. ऐसी चरम असामनताएँ बनाकर ईश्वर कहना क्या चाहता है ? अतिवृष्टि – अनावृष्टि की तरह अलग – अलग तरह से, दोनों कामनाएँ अ-परिपूर्णता लिए हुए. बड़ा ही अनोखा समन्वय. दोनों परिवारों में आपसी बच्चों को अपनाने की भी बातें होती थी, किंतु कुछ भी सही तरीके से हल नहीं हो पाया. शायद नारियाँ पुत्र – पुत्री को अपने कोख से ही जन्म देना चाहती थीं. अजीब, लेकिन कुछ हद तक स्वाबाविक और जायज ख्वाहिश थी उनकी. लेकिन उसे ईश्वर के अलावा कोई पूरी भी नहीं कर सकता था. खैर अंततः राव साहव को पुत्ररत्न की प्राप्ति तो हुई, किंतु पापा की पुत्री नहीं हुई. बेचारे बेटी के लिए तरसते रहे.

मुहल्ले के, सारे के सारे लड़के पापा के घर पर ही मजमा जमाते थे. उनकी सेवा में पापा की भार्या, जिसे सारे अम्मा पुकारते थे, कोई कसर नहीं छोड़ती थी. जब मर्जी चाय नाश्तों का दौर चलता ही रहता था. खेलने के लिए सारी सुविधाएं अक्सर पापा के घर से ही आया करती थीं. उनके बच्चे थे कि कभी – कभार साथियों से वसूली की सोच लेते थे, किंतु पापा और अम्मा जी से ऐसी बात कभी नहीं सुनी गई. पूरा घर, मुहल्ले के सभी बच्चों के लिए खुला रहता था, भले वे घर पर हों या न हों. हो सकता है घर की कोई अलमारी बंद कर जाते हों, पर किसी भी बच्चे पर यह बात कभी भी उजागर नहीं हुई.

किसी भी तरह के खेल से परहेज नहीं होता था. जो खेलो… सुविधा उपलब्ध हो जाती थी. सन् 60-80 के दो दशक उनने मोहल्ले को सभी बच्चों की भरपूर सेवा की. बच्चे भी उनके बर्ताव से बहुत खुश थे. स्कूल जाने के लिए सारे बच्चे पहले उनके घर पहुँचते, फिर सारे मिलकर स्कूल के लिए निकलते. वैसे ही किसी भी खेल के लिए जाने के पहले सब उनके घर पर ही इकट्ठा होते थे.

उस दौरान जब भारत में रेड़ियो आया ही था, पापा के घर करीब चार फुट ऊंचा एक रेडियो हुआ करता था जिसमें सिलोन, विविध भारती, रेड़ियो मास्को, वॉयस ऑफ अमेरिका के अलग अलग बैंड होते थे. कुल मिलाकर 13 बैंड वाला रेडियों था वह. बच्चे देर रात या भोर सवेरे, दिन – रात के किसी भी वक्त वहाँ जाकर क्रिकेट की कॉमेंट्री सुना करते थे. मैच मेलबोर्न में हो, जमैका में हो, बारबोडास में हो, एडेलेड में हो, पोर्ट ऑफ स्पेन में, लॉर्ड्स में या लीड्स में – या दुनियाँ में कहीं भी –  उस रेडियो में कॉमेंट्री आ ही जाती थी. रात – रात जागकर बच्चे कॉमेंट्री सुनते थे. किंतु अम्मा जी पढ़ाई की कीमत पर यह सब कुछ नहीं करने देती थी. यानी खेल का मजा लेना हो – खेल कर या सुनकर (उन दिनों टी वी अपने देश में आया ही नहीं था.) – छूट तो थी किंतु जायज मात्र – पढ़ाई का काम पूरा होने के बाद.

कभी कभी तो ऐसा लगता था कि वे किसी राजसी परिवार से जुड़े हैं. उनके रहने का ढंग ही राजसी था, पर कोई घमंड नहीं था. उनके सरकारी मकान (बंगला नहीं) के बगीचे में तरह तरह के पौधे लगे होते थे. कई पौधों के नाम तो बच्चों को आज भी पता नहीं होंगे. कुछ तो उनके संपर्क में आकर सीख गए होंगे. केक्टस, क्रोटेंस, लिली, रजनीगंधा और सब एक नहीं, तरह – तरह के – गुलाब, सेमंती, गेंदा के कई तरह के फूल – देखने में लुभावने लगते थे. उनमें ही कुछ केले के पेड़ होते थे. समय  – समय पर खाद आता था. उनके घर कोई माली नहीं होता था, पापा खुद बगीचे में काम करते थे. अपने बच्चों से कुछ करवाने की सोचते थे – जैसे कभी कभार पानी ही दे दें पौधों को, लेकिन बच्चे कब उनके हाथ आने वाले थे इन कामों के लिए. वे भी बच्चों के प्रति नरम स्वभाव के थे, इसलिए कोई जबरदस्ती भी नहीं करते थे.

घर पर आने वाले सारे बच्चे अनुशासन में रहते थे और यही वजह थी कि किसी के अभिभावक को इस बात पर कोई चिंता नहीं होती थी कि बच्चे स्वामी जी के घर पर हैं.

उन दिनों ही पापा के आखरी बेटे का जन्म हुआ. एक लड़की की ख्वाहिश ने परिवार की सदस्यो की संख्या बढ़ा ही दी थी. वह सबसे छोटा, स्कूली बच्चों के साथ खेलता रहता, मसखरी करता रहता. न जाने कितनी बार स्कूल जाते वक्त उनके कंधों पर बैठ जाता. बच्चों को भी बहुत ही लाड़ आता था  उस पर. आपसी प्रेम का अंजाम यह कि अक्सर वह कंधों पर बैठकर तसल्ली से पेशाब कर जाता. स्कूल ड्रेस भीग जाती और डर लगा रहता कि किस दिन स्कूल से बाहर खड़ा कर दिया जाए. पर नहीं – अम्मा इससे परिचित थीं. छुटके की ऐसी हरकतों से बचने के लिए, वे एक दो जोड़ा यूनीफार्म को प्रेस कर के रखती, कि बच्चे तुरंत नहाकर दूसरा यूनीफार्म पहनकर स्कूल जा सकें. इसी बीच अम्मा गीला यूनीफार्म धोकर सुखा देतीं, ताकि शाम को बच्चा अपने कपड़े पहनकर घर लौटे और उसके माता पिता नाराज न हों.

सबका समय मजे से बीतता गया. बच्चे बड़े होते गए. ऊंची पढ़ाई के लिए वे दूर दराज के कालेजों में दाखिला लेने लगे. इसी तरह बच्चे आपस मे बिछड़ते गए. लेकिन हर किसी त्यौहार या शादी बाराती – छुट्टियों – में सारे बच्चे एक जुट होते और कुछ हो न हो  अम्मा व पापा से मिलकर ही जाते. बाद में दौर आया उनकी नौकरियों का. कुछ तो ऱाज्य के ही अलग जिलों में नौकरी करने लगे तो कुछ देश के अन्य राज्यों में स्थापित हो गए. किंतु साल में कम से कम हर बच्चा एक बार छुट्टियों में अपने घर आता तो अम्मा – पापा से जरूर मिलता. अम्मा – पापा के लाड़ ने बच्चों में न अनुशासन पनपने दिया न ही पढ़ाई की तरफ कोई खास ध्यान देने दिया. उनमें से किसी को भी परढ़ी एकजदम रास नहीं आई.केवल एक ने ही कालेज में दाखिला लिया था बाकी तो इंटर में ही सिमट गए.

पापा के घर, पैसों की भरमार ने बिना इधर – उधर देखे बच्चों का ब्याह करा दिया. तब तक वे अपने पुश्तैनी बंगले में लौट आए थे. इसलिए सभी बच्चे अपने परिवारों के साथ उसी बंगले के विभिन्न भागों में ही रहते थे. बच्चे उस संपत्ति की भलीभाँति देख रेख नहीं कर सके. केवल एक ने ही नौकरी की, बाकी सब पापा के पैसों से बिजिनेस करने के पूरे जोश में थे. आदतों से बिगड़े बच्चों की गलत संगति ने उनकी संपत्ति के ह्रास में पूरा साथ दिया. धीरे धीरे संपत्ति घटने लगी और साथी छूटने लगे.

मोहल्ले के वे बच्चे, जो केवल दो भाई थे और छुट्टियों में घर आकर अम्मा – पापा से मिलने जाते थे, तो बेचारे दोनों बुजुर्ग उनसे पूछते बेटा क्या कमी थी हममें ? क्या नहीं था हमारे पास ? और भगवान ने इतने पुत्र भी दिए.  हमने उनके परवरिश में कौन सी कमी छोड़ी थी ? लेकिन देखो, एक भी सहारा नहीं बन सका. तुम दो भाई देखो किस तरह तकलीफों में पढ़कर भी आगे आए. भगवान हमसे किस जनम का बदला ले रहा है, जो हमें ऐसी सजा दे रहा है. इस बुढ़ापे में पापा कहाँ नौकरी करते फिरें ? बेचारे अम्मा – पापा के आंखों से उनके बच्चों के साथियों के सामने गंगा – यमुना बहने लगते. बच्चे भी बेचारे करें तो क्या करें ? हालात तो काबू से बाहर ही हो चुके थे. हालातों की नाजुकता देखकर वे वहां से चले जाते और कभी – कभी तो बुजुर्गों को तकलीफ देने से बचने के लिए वे छुट्टियों में आकर भी उनसे मिले बिना चले जाते. दिल तो दुखता था किंतु मिलना, नहीं मिलने से ज्यादा दुखदायी होता था.

मोहल्ले के बच्चों से सुना  भी है कि देखो सर्वसंपन्न परिवार का मुखिया आज 70 साल की उम्र में एक छोटे से ठेकेदार के पास 500 रुपए की नौकरी कर रहा है.

बात जहाँ अटकने लगी वह थी पापा के बच्चों की खुद की पढ़ाई और परवरिश. जिन्हें किसी भी चीज की कमी नहीं थी, बड़ों का असीम प्यार प्राप्त था उनके यहाँ कमी हो गई अनुशासन की. ज्यादा लाड़-प्यार ने बच्चों को अनुशासन नहीं सिखाया. घर के जिस एक बच्चे ने अपने आप समाज में रहकर अनुशासन सीखा था, उसे परमात्मा ने बहुत ही कम उम्र दी. समाज में रहने वाले खुरापाती तत्वों के कारण, वह अपने नौकरी के दौरान, गबन के केस में फँसा दिया गया. जिससे उसे मानसिक तनाव होने लगा. बहुतेरी कोशिशों के बाद भी जब उभर नहीं पाया, तो घर में खबर दी. पापा उसके लिए चिंतामग्न हो गए और अंततः चिंताओं से उभर नहीं पाए. उनका देहाँत हो गया.

बाबा की अंत्येष्टि में आए बालक को अब अपनी चिंता खाने लगी कि अब कौन सहारा ? वहाँ से विदा होने के पहले ही वह संसार से बिदा हो लिया. उसके दिल की धड़कन ने साथ नहीं दिया. शादी-शुदा – पत्नी व बालक को छोड़ गया,

बच्चों को हर तरह की बीमारियाँ होने लगीं. खाना- पीना और बैठे रहना उनकी आदत सी बन गई. बूढ़ी अम्मा परेशान रहने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकती थी. अंततः एक दिन इन सब परेशानियों से वे अचानक मुक्त हो गईं. उनकी इह लीला समाप्त हो गई.

भाईयों ने मिलकर, अकेले या दोस्तों के साथ अलग अलग धंधे शुरु किए किंतु एक भी सही नहीं चला. पापा के रहते मुर्गी पालन में कुछ सफलता मिली थी, लेकिन उनके हटते ही मुर्गियाँ भी बीमीरियों से मरने लग गई और धंधा चौपट हो गया.

जमीन की खरीदी – बिकवाली भी की किंतु साथियों ने कमीशन खा – खाकर  कमाई तो क्या, मूल भी डुबा दिया.

समाज के ऊपरी तबके में रहने के कारण वे बच्चे, न किसी बुजुर्ग से सलाह मशविरा करना चाहते थे, न ही कोई गुणी उनको समझाना चाहते थे. सारे बच्चों में धनी होने का घमंड जो समा गया था. शायद खाना – पीना और पढ़े लिखे न होने के कारण जोस्तों द्वारा दिएओ गए धझोके को समय से न पहचानना, ही इसका मुख्य कारण था, जो अन्य बीमारियों को भी समेट लाया. देखते – देखते एक – एक कर सारे भाई जग से विदा हो गए. .एक घर में बेचारी इतनी बेवाएं किस तरह रहती होंगी भगवान ही जानता है.

दुख तो बहुत होता था किंतु करने के लिए कुछ बचा न था. केवल भगवान से प्रार्थना की जा सकती है कि बच्चों को लायक बनाकर बेचारी – दुखियारी बहुओं का बेड़ा पार लगाए.

बड़ों ने कहा है दिन फिरते देर नहीं लगती, इस लिए घमंड तो करना ही नही चाहिए. चाहे ज्ञान का हो, धन का हो, या रूप का. जहाँ घमंड घर कर गया वहां से सारी संपत्ति सरकने लगती है. ज्ञान का भंडार भी घमंड के साथ ह्रास हुआ जाता है.

छोटी उम्र में इन तथ्यों को समझना मुश्किल होता है और जब समझ आने लगती है तब तक उम्र ढल चुकी होती है और अब समझ में आने का कोई लाभ होता नजर नहीं आता. इसलिए हमें चाहिए कि बड़ों के अनुभव का, उनके द्वारा प्रदत्त राय या सीख को अपना लें एवं उसका मीठा फल बुढ़ापे में खाएं. लेकिन कितने ऐसे कर पाते हैं ? इस मतलबी दुनियाँ में परखना भी मुश्किल हो जाता है कि कौन सही राय दे रहा है और कौन मतलबी.

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भाषा की लिपि…http://www.hindikunj.com/2015/02/language-script.html   भी देखें.

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एम. आर अयंगर.

मो. 8462021340

ई-मेल – laxmirangam@gmail.com

लेश मात्र प्यार

लेश मात्र प्यार

उन दिनों मेरा हाथ अपने हाथ में लिए,

गोदी में ले सहलाते – तुम

और कभी तुम्हारा हाथ लिए ,

सहलाती – मैं,

कभी पार्क में, तो कभी सिनेमा हॉल में,

कभी नहर किनारे, तो कभी नदिया तीरे,

तब बातें कम ही होती थी ,

पर एक दूसरे के अहसासों का,

अहसास हो ही जाता था.

कितना मधुर वक्त था ना वह !

बात आगे बढ़ती गई,

कभी तुमने मेरे बालों से खेला,

कभी मेरे गालों को सहलाया,

कभी मैं तुम्हारे सीने पर सर रखकर सो जाती

और कभी तुम मेरे गोदी मे सर रखकर सोते,

तुम्हारे उस खुरदरे दाढ़ी की चुभन भी मुझे भाने लगी थी.

हमने शायद सोचा था कि जीवन शायद उसे ही कहते हैं –

मन से मन का मिलन, दिन प्रतिदिन प्रगाढ़ होता गया

फिर एक दिन लगा कि अब तो दो मन एक हो गए हैं,

मजबूरन दो अलग- अलग तन में बसे हुए हैं.

लगा, अब उन्हें भी एकीकृत कर देना चाहिए.

तुमने ही तो प्रस्ताव दिया था ना ,

और हाँ, मैंने स्वीकार भी किया था.

अब हम दंपति हैं.

दुनियाँ की एक नई तस्वीर उभरने लगी है.

लगना लगा, इस प्यार और

मानसिक मिलन के अलावा भी

बहुत कुछ है संसार में.

हमने मानसिक मिलन के दौर में,

तो आसपास कुछ नहीं देखा.

इसमें अधिकार कम और जिम्मेदारियाँ ज्यादा हैं.

अपनी तो पता नहीं कहाँ गई,

पर अगली पीढ़ी की जिम्मेदारी में

सुबह – शाम का पता ही नही चलता.

शायद प्यार का यह एक और रूप है.

हम जिसे प्यार समझते थे वह तो

प्यार के सागर का शायद

सौवाँ अंश भी नहीं है,

लेश मात्र है.

अब हम अपने लिए कम और

औरों के लिए ज्यादा जीते हैं,

शायद यही प्यार का मर्म भी है.

और प्यार का धर्म भी.

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अयंगर.

21.07.2015.

 

 

बापू – फिर मत आना

बापू – फिर मत आना

तूफान से निकाल कर लाई

तुम्हारी वह कश्ती,

जो तुम हमें सौंप गए थे,

हम सँभाल नहीं पाए.

 

और वनप्राणी – रक्षण संस्था ने,

तेरे बंदर छीनकर

जबरन जंगल में छोड़ दिए,

बोले – जंगली जानवर पालना,

पशुओं पर हिंसा है,

उनकी स्वच्छंदता हर ली जाती है.

 

उधर बकरी न जाने क्यों नाराज हो गई,

उसने दूध देना बंद कर दिया,

अब बस चारा खाती थी,

खैर कोई बात नहीं,

तुम्हारी याद तो दिलाती थी,

पर, एक दिन चोरी हो गई,

पता नहीं किसने चुराई,

बहुत खोजा मिल न पाई,

डर रहा हूँ किसी ने

किसी ने बाजार के हवाले नहीं कर दी.

फिर खबर भी नहीं लग पाएगी

कि वह झटके के हवाले हुई

या उसकी खस्सी ही हो गई.

 

हाँ, तुम्हारी सहारे की डंडी,

मेरा भी सहारा बनी,

आए दिन मुझे कुत्तों और

साँडों से बचाती रही,

 

लेकिन एक दिन,

अपने बचाव में,

साँप मार रहा था,

साँप तो बच के भाग निकला,

पर लाठी टूट गई,

अब मेरे पास की

तुम्हारी हर निशानी

मिट गई,

हाँ एक घड़ी थी,

वह रखे रखे जंग खा गई,

क्योकि अब इलेक्ट्रानिक वाच आ गए हैं,

चाबी वाली घड़ियाँ तो एन्टिक मानी जा रही हैं. 

 

लेकिन बापू

मैं आज भी तुम्,

याद करता हूँ.

 

तुम्हारे नाम की कई स्कीमें

सरकार ने जो खोल रखी हैं,

उनके बारे रोज अखबार में पढ़ने मिलता है.

 

किसी दिन पक्ष,

तो किसी दिन विपक्ष,

उन पर कीचड़ उछाल ही लेता है…

 

क्या करें

स्कीमें भी तो अलग – अलग

सरकार की चलाई हुई हैं,

जब जिसको फायदा नजर आता है ,

वह थोड़ा कोस लेता है.

 

अब तुम तो यहाँ हो नहीं

कि लोग तुमसे डरेंगे,

तुम्हारी इज्जत करेंगे,

और कुछ उल्टा- सीधा कहने से

परहेज करेंगे.

 

बापू, अब जमाना भी बदल गया है,

“आऊट ऑफ साईट यानी

आऊट ऑफ माईंड”

का जमाना चल रहा है,

ऐसे में बोलो बापू कैसे

कोई तुम्हारे बारे सोच सकेगा.

 

जमाना कॉम्पिटीशन का हो गया है,

अब तो इंजिनीयरिंग और

मेडिकल करके भी नौकरी नहीं मिलती,

कोई अपना काम नहीं करना चाहता,

सब को सरकारी नौकरी ही चाहिए,

 

क्या करे सरकार भी,

सभी परेशान हैं,

 

ऐसे में एक बात जरूर है कि,

तुम्हारे नाम से कुछ भी चल जाता है,

कोई आपत्ति नहीं करता

इसलिए जहाँ कहीं भी

आपत्ति की संभावना होती है,

तो तुम्हारा नाम जोड़ लिया जाता है,

स्कीम बिक जाती है.

 

बापू, कभी कभी तो मुझे डर भी लगता है,

किसी दिन सर फिर गया,

तो कोई बिक्री बढ़ाने के लिए,

बाजार में गाँधी ब्राँड रम

या विस्की न उतार दे,

 

 

हाँ यह जरूर है कि वह दिन

देश के लिए अति दुर्भाग्य का दिन होगा,

फिर भी हालातों के मद्दे नजर

मुझे असंभव तो नहीं लग रहा,

मैं इन विचारों के साथ – साथ

काँपने लगता हूँ.

 

भगवान करे, ऐसा न हो,

जितना हो रहा है ,

क्या वह कम है कि

और की ख्वाहिश की जाए.  

 

बापू, एक सलाह देना चाहूँगा,

यही एक चीज

आज मुफ्त में मिलती है,

काम की हो या बेकाम की,

कारगर हो या न हो,

मिल ही जाती है.

 

गलती से भी धरती पर

फिर मत आना

और यदि आ गए.

तो देखोगे, कि

तुम्हारा कैसा मखौल उड़ाया जा रहा है.

बहुत दुख होगा तुम्हें,

मुझे डर है ,

कहीं हृदयाघात हो गया तो,

अब दूसरा राजघाट,

शायद मिले ना मिले.

 

एम.आर. अयंगर.

द्वंद … जारी है.


द्वंद … जारी है.

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राजस्थान के चाँदा गाँव में स्नेहल एक घरेलू जाना पहचाना नाम था. गाँव के कान्वेंट स्कूल में पढ़ने वाली स्नेहल पढ़ाई में अव्वल थी. मजाल कि उसके रहते कोई कक्षा में प्रथम आने की सोच भी लेता. इसके साथ वह थी भी बला की खूबसूरत. घर- बाहर सब उसे प्यार करते थे, पर अपनी – अपनी तरह से. लेकिन एक बात थी जो स्नेहल को सब से दूर रखती थी – उसका घमंड. उसकी खूबसूरती व अक्ल के चर्चे के कारण उसमें ऐसा स्वभाव उत्पन्न हो गया था.

जब कक्षाएं बढती गईं तो वहाँ नए – नए चेहरे आते जाते रहे. कुछेक बरस बाद, ऐसा ही एक चेहरा था – आदर्श. जो पास के गाँव के किसी स्कूल में पढ़ा करता था. पढ़ाई में वह भी बहुत अच्छा था. अब वह और स्नेहल एक ही स्कूल के छात्र हो गए थे. दोनों में अव्वल आने की होड़ लग गई. परीक्षा तक तो दोनों को इंतजार करना पड़ा. परीक्षाएं समाप्त क्या हुईं कि कक्षा में चर्चाएं होने लगीं कि इस बार प्रथम कौन आएगा.  आदर्श बोलता कम था इसलिए उसके दोस्त भी इस स्कूल में कम ही थे. इसलिए शोर तो स्नेहल का ही था.

इंतजार पूरा हुआ और परिणाम आए – आदर्श प्रथम. अब क्या था, घमंड ने सर उठा लिया. उधर आदर्श को यह अच्छा नहीं लगा. पढ़ाई में आगे – पाछे का नतीजा, अच्छा पढ़ने की होड़ से होना चाहिए, न कि घमंड या गुरूर से. वह मन-ही-मन स्नेहल से दूर होता गया. किंतु स्नेहल का घमंड था कि कमता ही नजर नहीं आता था. कक्षा की हर परीक्षा में स्नेहल को आदर्श से कम अंक मिलते और हर बार फिर उसका सोया घमंड जाग जाता.

एक अच्छी पढ़ने वाली खूबसूरत लड़की को घमंड में जलते देख आदर्श को दुख भी होता था. वह चाहता था कि स्नेहल किसी तरह अपना घमंड छोड़े, जिससे उसे भी कोई पसंद करने वाला मिल जाता. बाकी विधाओं में तो वह, अच्छी तो थी ही. लेकिन ऐसा हो नहीं रहा था.

हाईस्कूल से इंटरमीडिएट के दौरान शीतल ने स्कूल में प्रवेश किया. पढ़ाई में वह भी अच्छी थी. खूबसूरती तो बला की नहीं, ठीक-ठीक ही थी. स्वभाव से शीतल बहुत ही मधुर थी. पढ़ाई के चलते अब स्नेहल, आदर्श और शीतल तीनों में होड़ थी. नतीजतन शीतल, स्नेहल से आगे तो आ गई, पर आदर्श को पार न पा सकी. दोनों में आए दिन होड़ रहती कि कौन बाजी मार लोगा. यही चलता रहा दोनों में होड़ होती गई और स्नेहल की ओर से लोगों  का ध्यान हटने लगा. बहुतों ने सोचा अच्छा हुआ कि स्नेहल का घमंड तोड़ने कोई तो आया, उधर हालातों ने स्नेहल के घमंड को भी चकनाचूर कर दिया.

एक दूसरे की बराबरी करने या यों कहें कि सार्थक प्रतिस्पर्धा के कारण दिनों-दिन शीतल और आदर्श में करीबी आती गई. दोनों की मंजिल पढ़ाई में अव्वल करने की ही थी. एक लक्ष्य की ओर बढते – बढ़ते न जाने कब वे आपसी मानसिकता को पसंद करने लगे. उनमें एक अपनापन पनपता गया, जिसकी दोनों में से किसी को खबर भी नही थी.

इसका पहला एहसास आदर्श को हुआ, लेकिन उसने इस बात को उजागर करना उचित नहीं समझा. हो सकता है कि पौरुष ही इसका मुख्य कारण था. वह बात को अपने तक ही रखा रहा. हाँ इसके विपरीत कोई हरकत करने की कोशिश नहीं करता था, क्योंकि यह अपनापन उसे मंजूर था. क्या पता शीतल भी मन ही मन उसकी ओर आकर्षित हो रही हो ? भले ही वह शीतल की सहेलियों से बहनों सा बर्ताव करता लेकिन वह गलती से भी शीतल के साथ ऐसा व्यवहार करने से बचता, जिससे उसे कोई गलतफहमी न हो जाए. पता नहीं यह उसकी बचकाना हरकत थी या फिर उसे आभास हो रहा था कि इनसे मुखातिब शीतल उसकी मानसिकता को ताड़ लेगी.

इंटर पूरा कर स्कूल से जाते – जाते आदर्श ने शीतल को इतना तो जता दिया कि मैं तुमसे, तुम्हारी सहेलियों के साथ सा बर्ताव नहीं कर सकता. उसकी सोच में इतना काफी था यह जताने कि लिए कि –“मैं तुमसे प्यार करता हूँ” वह इससे ज्यादा खुलकर बात कहना नहीं चाह रहा था. एक मोड़ पर शीतल ने संदेश जरूर भेजा था कि तुम्हारे कारण का तो पता नहीं पर मैं तुम्हें पसंद करती हूँ. इससे आदर्श समझने लगा कि शीतल को उसकी अनुभूति का पता चल गया है.

इंटर के बाद आदर्श ने कोटा मे किसी कोचिंग संस्था मे प्रवेश लिया ताकि वह अपनी आगे की पढाई जारी रख सके. भर्ती के दिन ही उसे दूसरी कतार में शीतल नजर आई. वह उससे छिपता – छिपाता रहा. किंतु ऐसा कभी संभव हुआ है कि दोनों एक ही संस्था में एक ही जगह पढ़ रहे हों और आपसी मुलाकात न हो. एक दिन ऐसा हो ही गया कि दोनों आमने सामने हो लिए. दोनों में कोई भी पहल करना नहीं चाहता था.

प्यार कितना भी पुराना हो जाए सावन में फिर फलने – फूलने लगता है. ऐसा ही हुआ. फिर शीतल – आदर्श की नजदीकियाँ बढ़ने लगी. जाहिर था कि प्यार की आग दोनों की तरफ लगी थी. पर बात केवल पहल की थी. अब जब पहल हो ही गई तो दिन दूनी रात चौगुनी फलने लगी. ना जानें इस जुगलबंदी में उनने कब जीने – मरने की कसमें भी खा लीं. प्यार अब परवान चढ रहा था.

पूरी कोचिंग व बाद के दौरान अलग अलग कालेजों में होने के बाद भी वे एक दूसरे के शहर जाकर मिलते रहे. जिंदगी को बहुत करीब से एहसास किया एक दूसरे के मन को पूरी तरह भाँप लिया. एक बार शीतल ने ऐसा कुछ भी बताया था कि – उनके परिवार का एक नजदीकी लड़का, उससे नजदीकियाँ बढाने की कोशिशें कर रहा था लेकिन शीतल ने उसे घास नहीं डाला क्योंकि वह अपने जीवन में आदर्श के अलावा किसी को नहीं चाहती थी. और तो और उसने यह भी कहा था कि वह एक लड़का बिगड़ैल था. दोनों में आत्मीयता इस हद तक बढ गई कि उनके बीच कोई गोपनीयता बाकी नहीं रह गई थी.  हाँ नजदीकियाँ मन तक ही रही, तन पर काबू न कर सकीं. दोनों के अपने – अपने तर्क थे किंतु उनका एक ही मानना था कि मन के मिलन के बाद शादी और बाद में तन का मिलन.

दोनों की अलग – अलग जगहों से पढ़ाई चल रही थी. अंतिम सेमेस्टर के दौरान – अब दौर आया – नौकरी या पोस्ट – ग्रेजुएशन की तैयारी का. आदर्श गेट की तैयारी करने लगा, जिससे दोनों की संभावनाएं साथ चलती रही. शीतल किसी भी तरह की आगे की तैयारियाँ नहीं कर रही थी.

इसी समय न जाने क्यों आदर्श को लगा कि और शायद शीतल का मन धीरे धीरे आदर्श से हट सा रहा है.. कारण का कुछ पता न चल सका. परीक्षाओं के बाद  और दीवाली की छुट्टियों में घर पर होने की वजह से आपसी संवाद में रुक सा गया था. शीतल की तरफ से फोन उठना बंद ही हो चुका था. और जो कारण सामने आ रहे थे वे विश्वसनीय भी नहीं लग रहे थे. आपस में कोई गंभीर संवाद नहीं हुआ.

ऐसा लगने लगा कि वह अपनी राह चल पड़ी है, लेकिन कारण विशेष को कहने से बचती रही. पता नही उस पर क्या गुजरी थी कि ऐसा हो गया. दिन- रात संग जीने मरने की कसमें खाने वाली अचानक बिना किसी आपसी वजह के या कोई अन्य वजह बताए इस तरह रूठ जाए समझ में नहीं आया. पर किसी ने कुछ खास नहीं कहा. हाँ, लेकिन तब तक फासले बढ़ रहे थे.

इस तरह के स्वभाव ने दोनों के बीच की खाईयों को गहरा कर दिया. अंततः एक दिन आदर्श के मन आया, कि मुझे भी कुछ और कोशिश कर आगे बढ़ना चाहिए. इसी इरादे से उसने शीतल को फिर फोन लगाया. फोन नहीं उठा. आदर्श ने फिर बार – बार कोशिश की किंतु कोई जवाब नहीं आया. अब शायद उसे लगा कि उसने अंततः शीतल को खो दिया है.

वह उधर से जवाब न आता देख वह निराश हो गया. उसकी जानकारी लेने के लिए अब वह हर संभव कोशिश करने लगा . इसी दौरान शीतल के दूर के रिश्तेदार से भी बात हुई और उससे कहलवाया कि शीतल से कहे कि कम से कम एक बार बात तो कर ले. इरादे जो भी हों सही.

एक दिन शीतल के फोन उठाते ही आदर्श बहुत ही खुश हुआ. लेकिन उसकी यह खुशी क्षणिक ही रह गई – जब शीतल ने उसे बताया कि अब वह उसे न फोन करे और न ही उससे संपर्क साधने की कोशिश करे. उसने यह भी कहा कि अब मैं तुमसे न मिल सकती हूँ न बात कर सकती हूँ, अब तुम मुझे फोन मत किया करो. क्योंकि अब हमारा कोई रिश्ता नहीं रहा – “मैं तुमसे और बात तक करना नहीं चाहती” और फोन रखा गया.. यह तो बम का धमाका था, आदर्श के लिए. जो उसकी जिंदगी और जिंदगी में सब कुछ था, वही तो लुट गया था. और आश्चर्य यह कि वही तो लूट गया था. उसके तो होश फाख्ता हो गए. समझ में नहीं आया कि आखिर यह क्या हो रहा है और क्या हो गया है.

यहाँ वहाँ से पता चला कि उसके साथ अब कोई और है. जो सुना उससे ऐसा लगा कि शायद कभी शीतल ने कहीं जिक्र भी किया था कि वह आदर्श से दूर होने वाली है लेकिन आदर्श से यह बात छुपाए रखी. कुछ आपसी मित्रों ने भी बात को सँभालने की कोशिश की लेकिन हाथ कुछ न आया .

बहुतेरी कोशिशों के बाद जब अगली बार फोन उठा तो उसने बताया कि उसकी जिंदगी में अब कोई और है इसलिए सारे पुराने किस्से दफन कर दिए जाएं. आदर्श ने जानना चाहा कि वह खुशकिस्मत शख्स है कौन- सुनने पर कि वह वही पुराना विगडैल लड़का है जो कभी नजदीकियाँ बढ़ाने की कोशिश करता था – आदर्श बिफर गया. उसने चीख कर कहा – “उस के लिए – जिसे तुम दिन में पचास गालियाँ देती थी कि किसी काम का नहीं है…नालायक है – अब उसके लिए तुम मुझे नकार रही हो”. उधर से आवाज आई देखो वह जैसा भी है – अब मेरी जिंदगी में है. मैं उसके बारे में तुमसे कुछ सुनना नहीं चाहती. बातों का लहजा कुछ ऐसा था कि जब मैं तुम्हारे पीछे भाग रही थी तो तुम थे कि मुझसे दूर भागते जा रहे थे. इतनी दूर कि मेरे पाँव व मन थक गए थे. जब मैं और भाग न सकी तो तुम्हें छोड़ दिया. एकाकी हो गई .. उस वक्त, इसने मेरा साथ दिया – हाथ थामा .. अब वह मेरा है और मैं उसकी. तुमने तो मुझे नकार ही दि.या था. अच्छा है हम- तुम अब अलग हो जाएं और अलग ही रहें. आदर्श को समझ ही नहीं आया कि शीतल किस समय की बात कर रही है लेकिन उसे यह अच्छी तकह समझ में आ गया कि उसने रास्ते और हमसफर बदल लिए हैं.

शीतल ने जाहिर कर ही दिया कि अब वह किसी और के साथ है और आदर्श उससे संपर्क करने की कोशिश न करे. ऐसा कहा जा सकता है कि शीतल ने अब आदर्श को दूध की मक्खी की तरह से निकाल फेंका.

इससे आदर्श की जिंदगी नरक हो गई. उसका जीना हराम हो गया. हालात बिगड़ने लगे … डर था कहीं कोई गलत कदम न उठा ले. लेकिन समय, हर मर्ज की दवा, ने आदर्श को सँभाला. फिर भी वह शीतल को भुला तो नहीं पाया. अपने प्रति किए बर्ताव के लिए वह शीतल को सजा देने पर उतारू हो गया.

वह दिन आदर्श की जिंदगी का एक ऐसा दिन था जो हर दिन याद आता है. आज इतने बरसों बाद जब घर से शादी की बात चलती है, तो हर खाली वक्त शीतल की याद सताती है. एक तरफ पौरुष और एक तरफ चाह द्वंद चलता रहता है. शीतल ने तो अलग रास्ता अपना ही लिया था. कभी कभार तो दिल करता है कि शीतल को सबक सिखाया जाए ताकि वह भी उसकी तरह तड़पे – यह तो बदले की भावना थी. पर भूलना तो संभव हो ही नहीं रहा था.

समाज में आदर्श के चाहने वाले जितने भी लोग थे, सबने उसे समझाने की कोशिश की. किंतु उस पर सदमा इतना भारी था कि उससे शीतल भूली ही नहीं जाती थी. हमेशा उससे बदला लेने की भावना से वह पीड़ित होता रहा. सबने समझाया कि सच्चा प्यार पाने में नहीं, देने में है, यदि तुम शीतल से सच्चा प्यार करते हो, तो उसे खुश रहने की दुआएँ दो. लेकिन उस तड़पते दिल को यह रास नहीं आता था. कहते हैं कि प्यार अंधा होता है… अब लगता है कि आदर्श अब भी प्यार के उसी दायरे में समाया हुआ है.

कई बार वह औरों के कहने पर अपने आप को समझाने की कोशिश भी करता है फिर ऐसी हालातों में किकर्तव्य विमूढ़ आदर्श यही सोचता फिरता है कि इसका हल कहां से लाया जाए…

द्वंद जारी है.. देखें कब थमेंगा.

एम आर अयंगर.

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सिंदूर मेरे…

सिंदूर मेरे…

वक्रताओँ से उभर कर,

माँग की सूनी डगर पर,

लटों की लहरों पे चलकर,

नयन-झीलों में उतरकर,

पा सको दिल में जगह गर,

चमकोगे मेरे भाल पर,

सिंदूर बनकर.

 

अधर पर मुस्कान बनकर,

नयन में आह्वान बनकर,

मन में पीठासीन होकर,

जीत कर मेरे हृदय को,

हो जो हृदयासीन तो फिर,

चमकोगे मेरे भाल पर,

सिंदूर बनकर.

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अयंगर.

8462021340